दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा
करौ कुंवर को ब्याह, बिदा संग नई बहू घर में आई है
सोयवे बेड़, छानबे, आटो-चलनी संग में लाई है
सुंदर सुघड़ स्वरूप संग सूप, रजाई, गद्दा
खायबे के वासन देतू दाति, जाको दद्दा
जानि जाकी सास को गुस्सा, पानी को लाई डब्बा
आहारे ! ठुमक-ठुमक पग धरत गेल में, हसि रही विहंगा
हसि रही विहंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा
कमरा लीनौ घेरि,सास को धरि दई खाट उसारे में
लाज-शरम सब दई त्याग, कर रई बात इशारे में
तब कहे सास समझाय, सुनो चित लाय बहू मेरी बानी
जानै सबरे कुटुम की आज सुनाय दई कहानी
जानै सेवा करी बनाई, तब सास लई भरमाई
पतरी फूलकिया पैवौ, भूली पै दय मोटे अंगा
पै दय मोटे अंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा
सासु बनाय खोट बहू के, रौट देखि खिसियाई है
कहे कुलच्छिन कौन जनम की, मेरे घर में आई है
कहे शब्दन के बाण, होय तू राँड़, मरै तेरो भईया
तेरो है जाय सत्यानाश, मरै तेरी अइय्या
तब बहू क्रोध में आई, गारी खूब सुनाई
जूतम मार भई दोनों में, फिर है रही दंगम-दंगा
है रही दंगम-दंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा
सासु कहै तेरो खसम मरै, बहू कहै तेरो लला मरै
झगड़ा घर में बहुत बढ़ौ, तब पति बिचारो कहा करै
तब करि रहौ सोच-विचार, होय लाचार बुद्धि चकराई
एक लगे है जाकी मात, एक लगे है व्याहि
पछताय रहौ कुंवर विचारो, होतौ नाय व्याह हमारो
कहे जगदीश गढ़उवारो, मति करौ भजन में भंगा
मति करौ भजन में भंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा