दीनन के दीनानाथ, सुने मैंने भक्तन हितकारी।
हिरणाकुस प्रह्लाद भक्त पै, चाबुक जब मारे,
खंभ फार नरसिंह रूप धरि, नख सों काया फारे।
दीनन के दीनानाथ, सुने मैंने भक्तन हितकारी।
भरी सभा में नगन करैं, पांडव कुल की नारी,
दुशासन की भुजा चीर , खेंचत-खेंचत हारी।
दीनन के दीनानाथ, सुने मैंने भक्तन हितकारी।
गज कूँ पकरि लियो गरह ने, जल को बल भारी,
चक्र चलाय गरह सिर काटो, गज की विपदा टारी।
दीनन के दीनानाथ, सुने मैंने भक्तन हितकारी।