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छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। - महाभारत फाग

 छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ।

माँगे पाँच गाँव रहिबे कुँ याद वहाँ की भूल गयौ। द्रौपति कौ बैठाई जाँघ पै दुर्योधन मन फूलि गयौ। भरी सभा में चीर द्रौपदी कौ दुशासन ने लूटौ हो छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। भीम प्रतिज्ञा खेंचि लई, तेरी जाँघ गदा से तोरु गौ। तैनै अबला नंगिन करी तेरो वीधन माँस बखेरू गौ। ज्ञान गीता कौ फैलाओ, कृष्ण अर्जुन को समझायौ। बाण तुम कर में गहि लीयौ, युद्ध कौं काटि-काटि कीयौ। बदलै सब लैलैऔ अपनै अब एक-एक करि कूटौ हो छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। लेके गदा भीम अभिमन्यु, उत्तम कुँवर बढ़ौ आगे। दुर्योधन और कर्ण अश्वथामा बाण तानि पीछे भागे। बाण तानि अभिमन्यु अब शकुनि कौ सर फूटौ हो। छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। पुत्रहिं द्रौपति के दल में, रौंद-रौंद कै मारत है। पकरि गज की अभिमन्यु, उत्तम कुँवर पछारत है। खेल रहे खेल कुँवर वारे, वीर बहुतेरे मारे। जयद्रथ ने सुनि पाई काटत खेत किसान करै जैसे गेहूँ की लाई। भरमा सिंह गँड़ाऊ वारे, अब कौरव से हरि रूठो हो, छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ।


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