सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

अप्रैल, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

महाकाल तेजो वर्णम

जटा अरण्य रूद्र से, प्रवाह गंग धार है, पवित्र नील कंठ में, विशाल सर्प हार है। डमड डमड नाद पर, रूद्र रौद्र नाचते, शिव शिवत्व दें सदा, शिव से पुकार है॥ जटा-जूट के कुंज से, तरंग गंग शोभति, शिव के दिव्य भाल पर, सुरसरि विराजती। धधक रही ज्वाल भाल, बाल चन्द्र राजते, महाकाल के चरणों में, हम अनुराग मांगते॥ दिगम्बराय दिव्य तेज़, भस्म अंग सोहते, जटा कलाप मध्य चन्द्र, देव मन मोहते। गले विशाल मुण्डमाल, शेष नाग संग है, त्रिशूल धारि व्योम रूप, भक्ति उमंग है॥ पगों की थाप से धरा, डगमग डगमग डोलती, पुकार हर हर महादेव, कण्ठ कण्ठ बोलती। त्रिनेत्र ज्वाल जागती, कलि-कपट के काल को, प्रचण्ड रूप धारते, रक्षित सकल संसार को॥ कराल भाल पावका, धधध-धधक ज्वाल है, प्रचण्ड मुण्ड मालिका, थिरकती डमड ताल है। धिमिद्धिमिद्धिमिन् ध्वनन, गूँजता मृदंग है, शिवत्व के प्रकाश में, मिटा सभी विषाद है॥ नवीन मेघ मण्डली, घिरी घिरी घिरी खड़ी, अंधेरी रात में छटा, बिखरी बड़ी बड़ी। गले में लिपटा भुजंग, फूफ फूफ फूंकता, काल के काल का, ब्रह्माण्ड शीश झूकता॥ कराल भाल पट्टिका, धधक रही है अग्नि सी, विशाल कण्ठ धारिणी, जो गंग है प्रवहती। कपाल माला क...

जय अम्बे जगदम्बे माता

"जब-जब जीवन में भय, संकट और अंधकार घिर आता है… तब आदिशक्ति माँ दुर्गा का कवच, भक्तों की रक्षा करता है। यह केवल शब्द नहीं… यह दिव्य ऊर्जा है, जो तन, मन और आत्मा को सुरक्षा प्रदान करती है। ऋषियों ने जिसे गुप्त रखा, ब्रह्मा ने जिसे प्रकट किया… वही पावन ‘देवी कवच’ आज आपके समक्ष है। श्रद्धा से सुनिए… और माँ की कृपा को अनुभव कीजिए…" जय अम्बे जगदम्बे माता, रक्षा कर तू दिन और राता॥ तेरा कवच जो हृदय बसावे, भय-संकट सब दूर भगावे॥ [Verse 1 – Soft Devotional] गुप्त रहस्य सुनाऊँ माता, ब्रह्मा बोले मुनि से ज्ञाता। सर्वरक्षा करने वाला, देवी कवच बड़ा निराला॥ [Verse 2 – Build] शैलपुत्री प्रथम भवानी, ब्रह्मचारिणी रूप उजियारी। चन्द्रघण्टा मधुर झंकारे, कूष्माण्डा जग सृष्टि सँवारे॥ [Verse 3 – Stronger Energy] स्कन्दमाता ममता धारी, कात्यायनी संकट हारी। कालरात्रि भय हर लेती, महागौरी शांति देती॥ [Chorus Repeat – Bigger] जय अम्बे जगदम्बे माता, रक्षा कर तू दिन और राता॥ तेरा कवच जो हृदय बसावे, भय-संकट सब दूर भगावे॥ [Verse 4 – Heroic] सिद्धिदात्री वर बरसावे, नवदुर्गा सब कष्ट मिटावे। नाम तुम्हारे जो भी गा...

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम् - पूर्ण हिंदी काव्यानुवाद

[Verse 1] हे गिरिनंदिनि सुखदायिनी, जग को आनंद देने वाली विंध्यगिरि में वास करने वाली, सबको राह दिखाने वाली हे भगवति शिवप्रिया भवानी, सदा दया बरसाने वाली जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, शिवप्रिये, हे शैलसुते॥ [Verse 2] देवों को सुख देने वाली, दुष्टों का संहार करे तीनों लोकों की पालनहारी, पाप-संताप को दूर करे दानव-कुल का नाश करे माँ, अमृत-सुधा बरसाती है जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, शिवप्रिये, हे शैलसुते ॥ [Verse 3] हे जगदम्बे कल्याणी माँ, वन-उपवन में वास तेरा हिमगिरि के ऊँचे शिखरों पर, पावन धाम तेरा मधु-कैटभ संहारिणी, प्रेममयी मधुर वाणी तेरी जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, शिवप्रिये, हे शैलसुते ॥ [Verse 4] शत्रु-दल को खंड-खंड कर, गज-मस्तक काट गिराया सिंह-सवारी दिव्य विराजी, वीरों का तूने सम्मान किया  शक्ति भुजा में भरकर माता, मुंडों का ढेर लगाया जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, शिवप्रिये, हे शैलसुते ॥ [Verse 5] रण-मैदान में अजेय बनी तू, अद्भुत बल तूने पाया चतुर, महाज्ञानी शिव को, अपना शांति दूत बनाया दुष्टों के दूत चले जब, काल-पथ उनको दिखाया जय जय हे महिषासुरमर्दिनि, शिवप्रिये, हे शैलसुते ॥ [Verse 6] शरण ...