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महाकाल तेजो वर्णम

जटा अरण्य रूद्र से, प्रवाह गंग धार है,

पवित्र नील कंठ में, विशाल सर्प हार है।

डमड डमड नाद पर, रूद्र रौद्र नाचते,

शिव शिवत्व दें सदा, शिव से पुकार है॥


जटा-जूट के कुंज से, तरंग गंग शोभति,

शिव के दिव्य भाल पर, सुरसरि विराजती।

धधक रही ज्वाल भाल, बाल चन्द्र राजते,

महाकाल के चरणों में, हम अनुराग मांगते॥


दिगम्बराय दिव्य तेज़, भस्म अंग सोहते,

जटा कलाप मध्य चन्द्र, देव मन मोहते।

गले विशाल मुण्डमाल, शेष नाग संग है,

त्रिशूल धारि व्योम रूप, भक्ति उमंग है॥


पगों की थाप से धरा, डगमग डगमग डोलती,

पुकार हर हर महादेव, कण्ठ कण्ठ बोलती।

त्रिनेत्र ज्वाल जागती, कलि-कपट के काल को,

प्रचण्ड रूप धारते, रक्षित सकल संसार को॥


कराल भाल पावका, धधध-धधक ज्वाल है,

प्रचण्ड मुण्ड मालिका, थिरकती डमड ताल है।

धिमिद्धिमिद्धिमिन् ध्वनन, गूँजता मृदंग है,

शिवत्व के प्रकाश में, मिटा सभी विषाद है॥


नवीन मेघ मण्डली, घिरी घिरी घिरी खड़ी,

अंधेरी रात में छटा, बिखरी बड़ी बड़ी।

गले में लिपटा भुजंग, फूफ फूफ फूंकता,

काल के काल का, ब्रह्माण्ड शीश झूकता॥


कराल भाल पट्टिका, धधक रही है अग्नि सी,

विशाल कण्ठ धारिणी, जो गंग है प्रवहती।

कपाल माला कण्ठ में, विराजती है शान से,

भजूं मैं भोले नाथ को, बड़े ही शुद्ध मान से॥


मनोज गर्व मोचनं, विशाल भाल लोचनं,

स्मरादि गर्व नाशनं, समस्त दुःख मोचनं।

गजासुर विमर्दनं, तमोगुण विनाशनं,

भजूं मैं शिव पिनाकिनं, सदैव मोक्ष शासनं॥


न मान की है लालसा, न अपमान का ही भय,

न जीत की है कामना, न हार का ही संशय।

जो शून्य में विलीन है, जो पूर्ण का आधार है,

वही तो आदि अंत है, वही तो सत्य-सार है॥


शिला कठोर पुष्प सेज, मोती हो या सर्पहार,

मित्र हो या शत्रु पक्ष, माटी हो या रत्नहार।

तरुणी हो या तृण हों, महाराज या कंगाल हों,

समत्व भाव शिव रखें, उन्हें भजुं मैं सर्वदा॥


धधक रही है ज्वाल भाल, व्याल फूफ से प्रबल,

प्रचण्ड नृत्य मग्न शिव, हिला रहे हैं भू-अटल।

धिमि-धिमिन् मृदंग थाप, गूँजती दिगंत में,

प्रचण्ड ताण्डव शिव, मग्न अपने अंत में॥


अनन्त कोटि विश्व में, शिवत्व ही प्रमाण है,

शिव ही सत्य, शिव सुंदर, शिव ही प्राण है।

महाकाल! महाकाल! महाकाल!


सत्यम शिवम सुंदरम

हर हर महादेव

शिव तांडव का भाव अनुवाद - जगदेव सिंह भदौरिया 

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