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फाग चौताल : वृज मुरली बजावत श्याम


वृज मुरली बजावत श्याम

बृज मुरली बजावत श्याम रहा नही जाई ॥


लै लै नाम मुरलि में सब को, मिलो मिला दुनि लाई ।

सुनि बृजवनिता अपनी महल से ।

सब चली हैं सो लाज गँवाई, रहा नहीं जाई ।।


शिरकी चुनरी कमर पहिरे हैं, कमरकी शिपै ओढ़ाई ।

अन्जन नैनन बीज लगावत ।

शिर सेंदुर लेत लगाई, रहा नहीं जाई ॥


कोउ धन रही पियावत आपन, कोउ रहि पलंग बिछाई

कोउ जेवनार बनावत भीतर ।

कोउ बसन बिना उठी धाई, रहा नहीं जाई ॥


कोउ गरिआवन लागी मुरलि को, जिन हम को बौराई ।

घर में रहा नहीं जात महिपति ।

हरी की मुरली तो है सुखदाई, रहा नहीं जाई ॥


उलारा

खेलहि कृष्ण मुरार, विन्दावन होरी ।।

करतल ताल सभी कर शोभित,

हरि नाचे संग नर-नार, विन्दावन होरी

गहि बहियां कोई अधर मिलावत,

गल चूमत बारम्बार, विन्दावन होरी

श्याम सखे ब्रज की सब नारी,

दी तन की दसा बिसार, विन्दावन होरी ॥

(ठाकुर भीम सिंह)


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