लाज मोरी राखौ हो महाराज ॥
मध्य-सभा में बैठि द्रौपदी, दुर्योधन मुसक्यात ।
अधम चीर मोरा खीँचे दुशासन, नग्न होत मेरो गात
भीषम-द्रोण-कर्ण सब बैठे, कहि न सकै कोई बात ।
खड़ी द्रौपदी इत उत देखें, हेरत प्रभु की बाट ?
कहै द्रौपदी सुनौ भीमजी, करना है
यहु काज ।
कोटिन कुंजर का बल तुम्हरे, ऐ हे कौने काज ?
सूरदास, प्रभु तुम्हरे दरश को, हरि-चरण चित्त लाग।
टेर द्रौपदी की सुनि पायौ, फाँदि परे ब्रजराज
लाज मोरी राखौ हो महाराज ॥
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