बनवारी हो जब टेर सुनों बनवारी
निरखे बैठि झरो का ते फिरि तिनि ते कहा अंधेरी है।
स्वांश-स्वांश में वासु करें भगवान बसें कहा देरी है।।
सो०- दौरि द्वारिका से सुधि लीनी तब बढी शीशते सारी हो
बनवारी हो जब टेर सुनों बनवारी
पलक बन्द द्रोपति के है गए लागी डोरि गुसैयाँ ते।
चकित सभा जब चीर बढो एक तगा न उधरौ बंयाँ ते ।।
सो०- जाकी लाज विधाता राखै कहुँ होइ न ताकी ख्वारी हो
बनवारी हो जब टेर सुनों बनवारी
खेचिर पटुढेर करै फिरि तौर ना शौचै अभिमानी।
पर वस भई थकी दोऊ बैयों मुख सेह नाहि कठै बानी।।
सो०- खुद दुर्योधन की मति मारी जो नैननि रहौ निहारी हो
बनवारी हो जब टेर सुनों बनवारी
दुश्मन मरै न दुश्मन कौसें कोंसें पड़ा कसैया के।
होगी वहे जो प्रभू रचि राखा सिग की डोर कन्हैया के ।।
सो०- सदाँ पछ्याँ ना पुरबैया भई अभिमानी की ख्वारी हो
बनवारी हो जब टेर सुनों बनवारी
दुश्मन हारि गयौ दूशासन अपुते बठि गयौ धरनी।
निज करनी कौ जगु फलु पावै पापी तरै न बैतरनी।।
सो०- अजब द्वारिका कहाँ हथनापुर अब भई न नारिं उधारी हो।
बनवारी हो जब टेर सुनों बनवारी