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दीनन के दीनानाथ, सुने मैंने भक्तन हितकारी। - होली फाग

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बनका निकरि गए दोउ भाई - रामायण फाग

बनका निकरि गए दोउ भाई॥ आगे-आगे राम चलत हैं, पाछे लक्षिमन भाई। ताके पाछे मातु जानकी, झारखंड का जाई॥ राम बिना मोरि सूनी अयोध्या, लक्षिमन बिनु चौपारी। सीता बिना मोरि सूनी रसोइयाँ, भोजन कौन बनाई॥२॥ घर माँ रोवें मातु कौसिला, द्वारे भारत भाई। राजा दशरथ प्राण तज्यों है, कैकइ मन पछिताई॥३॥ जेहि बन बाघ सिंह बहु बोलें, जेहि बन कोउ न जाई। तेहि बन जइहैं राम लच्छिमन, कुश की सेज बिछाई॥४॥ लंका जीति राम घर आए, घर-घर बजे बधाई। तुलसीदास भजो भगवाने, राज विभीषण पाई॥ ----------------------------- निकर गए दोऊ भाई, वन खों निकर गए दोऊ भाई। आगे-आगे राम चलत हैं,पाछें लछमन भाई। तिनके पाछों चलें जानकी, सोभा बरन न जाई॥ असाढ़ा गरजै भादों बरसै, पवन चलै पुरवाई। काऊँ बिरछ तर भींजत हुएँ, राम लखन दोई भाई॥ वन-वन फिरें प्रभु सीत समेत, धीरज धरत रघुराई। कंटक कुसुम सम सहत सब, धर्म रीति निभाई॥ राम बिना मेरी सूनी अयोध्या, लक्ष्मण बिना ठाकुराई। सीता बिना मेरी सूनी रसोई, कौन करे चतुराई॥ दुख सुख सब सम जानि चले, नयना नीर बहाई। लोक लाज कुल धर्म सँवारत, वन पथ लिए रघुराई॥ रावण मार राम घर आए, घर-घर बटत बधाई। माता कौशल्या आरती उतारें, स...

दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा - हास्य फाग

दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा करौ कुंवर को ब्याह, बिदा संग नई बहू घर में आई है सोयवे बेड़, छानबे, आटो-चलनी संग में लाई है सुंदर सुघड़ स्वरूप संग सूप, रजाई, गद्दा खायबे के वासन देतू दाति, जाको दद्दा जानि जाकी सास को गुस्सा, पानी को लाई डब्बा आहारे ! ठुमक-ठुमक पग धरत गेल में, हसि रही विहंगा हसि रही विहंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा कमरा लीनौ घेरि,सास को धरि दई खाट उसारे में लाज-शरम सब दई त्याग,  कर रई बात इशारे में तब कहे सास समझाय, सुनो चित लाय बहू मेरी बानी जानै सबरे कुटुम की आज सुनाय दई कहानी जानै सेवा करी बनाई, तब सास लई भरमाई पतरी फूलकिया पैवौ, भूली पै दय मोटे अंगा पै दय मोटे अंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा सासु बनाय खोट बहू के, रौट देखि खिसियाई है कहे कुलच्छिन कौन जनम की, मेरे घर में आई है कहे शब्दन के बाण, होय तू राँड़, मरै तेरो भईया तेरो है जाय सत्यानाश, मरै तेरी अइय्या तब बहू क्रोध में आई, गारी खूब सुनाई जूतम मार भई दोनों में, फिर है रही दंगम-दंगा है रही दंगम-दंगा, दंगा हो सुनि सासु बहू को दंगा सासु कहै तेरो खसम मरै, बहू कहै तेरो लला मरै झगड़ा घर में बहुत बढ़ौ, तब पत...

छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। - महाभारत फाग

  छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। माँगे पाँच गाँव रहिबे कुँ याद वहाँ की भूल गयौ। द्रौपति कौ बैठाई जाँघ पै दुर्योधन मन फूलि गयौ। भरी सभा में चीर द्रौपदी कौ दुशासन ने लूटौ हो छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। भीम प्रतिज्ञा खेंचि लई, तेरी जाँघ गदा से तोरु गौ। तैनै अबला नंगिन करी तेरो वीधन माँस बखेरू गौ। ज्ञान गीता कौ फैलाओ, कृष्ण अर्जुन को समझायौ। बाण तुम कर में गहि लीयौ, युद्ध कौं काटि-काटि कीयौ। बदलै सब लैलैऔ अपनै अब एक-एक करि कूटौ हो छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। लेके गदा भीम अभिमन्यु, उत्तम कुँवर बढ़ौ आगे। दुर्योधन और कर्ण अश्वथामा बाण तानि पीछे भागे। बाण तानि अभिमन्यु अब शकुनि कौ सर फूटौ हो। छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। पुत्रहिं द्रौपति के दल में, रौंद-रौंद कै मारत है। पकरि गज की अभिमन्यु, उत्तम कुँवर पछारत है। खेल रहे खेल कुँवर वारे, वीर बहुतेरे मारे। जयद्रथ ने सुनि पाई काटत खेत किसान करै जैसे गेहूँ की लाई। भरमा सिंह गँड़ाऊ वारे, अब कौरव से हरि रूठो हो, छूटौ हो कर काँपि - भूमि सर छूटौ। लोक संगीत पारंपरिक गीत देहाती भजन रिवायती राग लोक संस्कृति भारत Holi f...

अब तौ रामध्वजा फहरानी | फाग भजन के लिखित बोल

अब तौ रामध्वजा फहरानी॥  चमकै ढाल फरहरी तेगा, गर्द लागि असमानी । लक्ष्मण बीर बालि सुत अंगद, हनोमान अगवानी ॥९॥  कहै मदोदरि सुनु पिय रावण, त्रिभुवन पति से ठानी । जेहि समुद्र का मान करत रह्यो, तामें सिल उतरानी ॥२॥ आज पवन अँगना ना बुहारें, मेघ भरै ना पानी । लछिमी सरासर धान न कूटे, कहै मदोदरि रानी  ॥३॥  विनती करो जाय पिय उनकी, चूक परी अति भारी ।  तुलसीदास भजौ भगवाने, करौ न अब अभिमानी ॥५॥  फाग भजन के लिखित बोल पाने के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब कीजिये ! 

Faag Sumarni : फाग सुमरनि

माता सूरसती सिर नाई, बसो हिये आई। दोऊ कर जोड़ विनय करूँ तुमसे, बसो कंठ पर आई। गौरी के पुत्र गणेश को सुमिरो। भूले अक्षर देव बताई, बसो हिये आई। पारब्रह्म ब्रह्मा को सुमिरो, सृष्टि दीन्ह बनाई। सुमिरन करूँ धरती माता का हो। माता दुर्गा को शीश नवाई, बसो हिये आई। नृप दशरथ का सुमिरन करके, सुमिरो राम की माँई, राम लखन सीया सुमिरन करके। हनुमान को लेव मनाई,बसो हिये आई। महादेव देवन के देवा उनको शीश नवाई। सब देवन का सुमिरन करके। ‘हिम्मत’ कहते सिर नाई, बसो हिये आई। उलारा स्वर दीजे आए, वीणा वादिनी माता। रचियेता स्वर्गीय हिम्मत राम शर्मा, फ़िजी 

Holi Faag Lyrics : ऐसी कर्मन की गति न्यारी

 टेक : ऐसी कर्मन की गति न्यारी कर्म वश  केकई ने माँगि लए वरदान  कर्म के प्रताप राजा दशरथ छोडे प्राण  कर्म फल देने गए मिटि जात सम्मान  कर्म के प्रताप राजा राम गए बनवास सीता को हरन भयौ  भूल गए भूख-प्यास  कर्म के प्रताप राजा रावण कौ भयो नाश  सोने की लंक पंजारी, ऐसी कर्मन की गति न्यारी।  कर्म प्रताप राजा हरिश्चन्द्र दियौ दान  राजा सुत रानी तीनो काशी कियौ प्रस्थान काशी में बिके है तीनो भूलि गए कुल-खान कर्म के प्रताप जाइ मंगी के भरौ है नीर  एक जे टका के पीछे फाड़ लियौ आधौ चीर  कौनु है मिटइया ऐसे कर्म के लिखै कौ वीर  भई सब तराँ ख्वारी, ऐसी कर्मन की गति न्यारी।  कर्म के प्रताप पांडु पुत्र हारे धन-धाम द्रौपदी कौ चीर खींचौ बहुत भए बदनाम  बारह बर्ष वन रहे भीख माँगि गाम-गाम कर्म के प्रताप राजा नल पै विपति आई माँगे नाइ भीख मिली भूलि गरे ठकुराई तेली की हूँ पारि हॉकी कीरति जहान गाई  परि गयौ कर्म पिछारी, ऐसी कर्मन की गति न्यारी।  कर्म की डोरि फैली बाँध गयौ संसार कर्म की नीयति ताहि भोगि रहे नर नारि सुख दुख फल सोतौ कर्म क...