माता सूरसती सिर नाई, बसो हिये आई। दोऊ कर जोड़ विनय करूँ तुमसे, बसो कंठ पर आई। गौरी के पुत्र गणेश को सुमिरो। भूले अक्षर देव बताई, बसो हिये आई। पारब्रह्म ब्रह्मा को सुमिरो, सृष्टि दीन्ह बनाई। सुमिरन करूँ धरती माता का हो। माता दुर्गा को शीश नवाई, बसो हिये आई। नृप दशरथ का सुमिरन करके, सुमिरो राम की माँई, राम लखन सीया सुमिरन करके। हनुमान को लेव मनाई,बसो हिये आई। महादेव देवन के देवा उनको शीश नवाई। सब देवन का सुमिरन करके। ‘हिम्मत’ कहते सिर नाई, बसो हिये आई। उलारा स्वर दीजे आए, वीणा वादिनी माता। रचियेता स्वर्गीय हिम्मत राम शर्मा, फ़िजी
भदावर के लोकगीतों में चंबल की माटी की सौंधी-सौंधी गंध महकती है। जन मानस ने इन गीतों को गाते-गाते विविध रूप प्रदान किए हैं। लाखों कंठों ने गा-गा कर और लाखों लोगों ने मुग्ध होकर सुन-सुन कर इन गीतों को परम शक्तिशाली और हृदयस्पर्शी बना दिया है। लोकगीतों में धरती गाती है, पर्वत गाते हैं, नदियां गाती हैं, फसलें गाती हैं होली के भजन लिरिक्स, होली के रसिया लिरिक्स, होली गीत लिरिक्स इन हिंदी, होली लोक गीत इन हिंदी लिरिक्स, होली गीत लिरिक्स, लिरिक्स होली के भजन, लिरिक्स होली भजन, होली भजन डायरी,